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Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Palबच्चों को मनोवैज्ञानिक तरीके से सरलता से बहुत कुछ सिखाया और समझाया जा सकता है। इसके लिए बाल मन को समझना जरूरी है। बच्चे फैंटेसी, कल्पना की दुनिया, पशु-पक्षियों, परियों, काल्पनिक कार्टून कैरेक्टर, काल्पनिक पात्रों आदि की जानकारियां पसंद करते हैं। कहानियाँ हमेशा से बच्चों की दुनिया में महत्व रखती हैं। पहले अक्सर घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों को सोने से पहले कहानियां सुनाया करते थे। मनोविज्ञान के अनुसार, सोने से पहले पढ़ी या सुनी गई बातें बच्चों को अच्छे से याद रहती हैं। क्योंकि इस समय पढ़ी या सुनी गई बातों के मेमोरी ट्रेसेज उनके मस्तिष्क में बिना विशेष मेहनत के बन जाती हैं।
आज वीडियो गेम, कंप्यूटर और इंटरनेट के जमाने में बाल साहित्य, विशेषकर मातृ भाषा में लिखी गई कहानियां कम हो रही हैं। इसलिए कम उम्र से बच्चों को कहानियां पढ़ने की आदत लगानी चाहिए। कहानियां बच्चों के विकास का महत्वपूर्ण अंग है । कहानियां बच्चों में कल्पनाशीलता विकसित करती हैं और उनकी पढ़ाई में भी मदद करता है। मातृभाषा में पढ़ी गई कहानियां उनमें जिज्ञासा, भाषा विकास, कल्पनाशीलता, समझदारी और रचनात्मकता विकसित करती हैं। फैंटेसी और अच्छे अंत वाली कहानियां बच्चों में सकारात्मक व्यवहार बढ़ाती हैं। इससे उनकी भाषा और सामान्य ज्ञान पर अच्छी पकड़ बनती है।
रेखा
मैं मनोविज्ञान में पीएचडी, मनोवैज्ञानिक काउंसिलर और एक लेखिका हूँ। नन्हें बच्चों से ले कर स्नातकोत्तर तक के छात्रों को पढ़ाने के दौरान मैंनें बहुत कुछ पढ़ा और लिखा। मेरे शोध के दौरान महिलाओं और बच्चों की समस्याओं की ओर ध्यान गया और उनकी बातों में मेरी रुचि में बढ़ गई। यह मेरे लेखन में भी झलकता है।
रचनात्मक लेखन में मेरी रुचि अनजाने व अवचेतन रूप से हुई। वर्षों पहले, पोस्ट ग्रेजुएट साइकोलॉजी के लिए स्टडी मटीरीयल, कुछ आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लेख लिखने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मुझे लिखना कितना पसंद है। इससे मुझे ताज़गी और ख़ुशी मिलती है। मेरी यह जीती-जागती पुस्तक लेखन के प्रति मेरे प्यार और लगाव का साकार रूप है।
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